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सिल्विया डक्टर, स्वामी भीमानन्द |
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एमस्टरडम, नेदरलेन्ड मैं पैदा हुई सिल्विया ने वार्सिलोना आने से पहले यूरोप के अनेक स्थानो मैं निवास, अध्ययन तथा काम किया. सिल्विया ने अपना पेसावर जीवन अन्तर्राष्ट्रीय वाणिज्य कारोवार मैं से प्रारम्भ किया, परन्तु १९९६ मैं उन्होने अलग होके स्वयं की व्यक्तिगत यात्रा प्रारम्भ करने के लिये निश्चय किया. इस यात्रा ने उनको अनेक प्रकार के अध्ययन तथा प्रशिक्षण (जैसे, क्रेनियोसेक्रल थेरपि अर्थात 'मस्तिस्क तथा मेरुदण्ड के निचले हिस्से से निकले हुए स्नायु-तन्त्र सम्वन्धी उपचार', रैकी १-३, NLP(एन एल पी) अर्थात 'मस्तिस्क भाषा सम्वन्धी क्रमादेश' और उसकी शिक्षा, एक्युप्रेसर और रिफ्लेक्सोलोजि, रंग और जिओमेन्टिक विश्लेषण, पषु (व्यबहार) उपचार ,...) के लिये आगे लेके गया और उन्होने स्वयं एक कार्यप्रणाली की स्थापना की जिसमे वह प्रत्येक व्यक्ति तथा पशु के लिये बिशेष रूप से बनाए हुये स्वास्थ्य कार्यनीति प्रदान करते हैं. सिल्विया के जीवन मैं २००६ का अंत एक नयी मोड़ थी. उन्होने 'टबि अलेग्जान्डर' के व्यक्तिगत विकास के लिये अधिबेशनो मैं हिस्सा लिया. यह प्रारम्भिक अधिबेशनो से आगे चलके उन्होने सफाई, निवारण और 'डि.एन.ए सक्रियण' आदि उच्च विषय मैं अपना नामांकन किया तथा ईश्वरीय दम्पति 'इभोन डिलाफर' और 'टबि अलेग्जान्डर' के साथ केलिफर्णिया मैं 'ट्रान्सेडेन्टल रिवर्थिन्ग' अर्थात 'अन्तर्ज्ञान से पुनर्जन्म' प्रक्रिया को देखा और उससे ज्ञान प्राप्त किया. उनकी चेतना मैं एक विशाल परिवर्तन आया और यह उनकी स्वास्थ्य संबंधी शिक्षा को सम्पुर्ण करने के लिये आखरी कड़ी बनी - जिसका परम उद्देश्य अपना और मानवता का हित करना था. अपने अतीत से आये हुए विश्वास, जो हमारे व्यक्तिगत उन्नति मैं बाधा डालती हैं, उनका अतिक्रमण करना तथा उनको एक सुरक्षित और आनंदपूर्ण वातावरण मैं एक शक्तिशाली तथा नूतन वर्तमान मैं रूपान्तरण करना - हाँ, सिल्विया इसी उत्तर के खोज मैं थी. स्वयं सिल्विया ने एक स्वीकृति प्राप्त 'ट्रान्सेडेन्टल रिवर्थिन्ग' शिक्षक के रूप मैं स्नातक किया, उसके पश्चात 'मैत्री भयोलेट-सीलभर अडर' अर्थात 'मैत्री बैंगनी-रजत समाज' मैं 'स्वामी भीमनंद' के रूप मैं दीक्षा लिया, और बाबाजी के आदिम क्रिया योग परंपरा मैं दीक्षा लिया. उन्होने एक नये जीवन मैं अपने कदम रखे और 'ट्रान्सेडेन्टल रिवर्थिन्ग' के नियमो का सम्मान करते हुए, वह मानवता की सेवा तथा एक प्रतिभामय और आनंदमय पुनर्जन्म के लिये स्वयं को समर्पित किया. |
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