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२९ अक्टूबर, २००६, श्री बाबाजी ने
स्वामी अमरानन्द जी को  संस्थापक बनने के लिये प्रस्ताव दिया
रजत बैगनी मैत्री स्वामी समाज! (प्रतिलिपि देखें)

सर्वोत्तम दिक्षा तभी होती है जब कोई अपनी समर्पित हृदय के सामर्थ्य पर अपने आपको 'एक' मैं पुनर्जन्म देता है; जब कोई सम्पूर्ण रूप से विश्वास करता है की उसका हृदय अभी परमात्मा के हातों मैं है.

जब ये होता है, आखों से पर्दे उठ जाते हैं, और वास्तविकता एक स्वच्छ तथा स्फुर्तियमान दीन के रूप मैं उदित होती है, ये हम सबको मैत्री के पवित्र बन्धन मैं बन्ध जाने के लिये आमंत्रित करता है, हर जीव तथा हर समय तथा अंतरिक्ष के हर रूप के संग...जहाँ हम अपने अंदर के ईश्वर से आमने सामने होते हैं और सारा जीवन के लिये सेवा, अनुकम्पा, निश्चितता और प्रेम का एक रोमन्चक यात्रा प्रारम्भ होती है.

~
स्वामी अमीनन्द

जो रजत बैगनी मैत्री स्वामी समाज को आदेश करते हैं वह लोग पवित्र मैत्री के वास्तविकता मैं जागृत होते हैं, जो मैत्री से पूर्ण विचार, कार्य तथा भावनात्मक प्रकाशन के माध्यम से एक अहिंसात्मक दुनियाँ को जन्म देती हैं.

हमारी समाज मैत्री को सर्वोत्तम श्रेणी के धर्मो मैं स्थान देती है, जो सभी विश्व के सभी जीबों मैं सार, एक मात्र 'स्रष्टा चेतना शक्ति' के साथ एक स्नेह पूर्ण मित्रता के रूप मैं गूंजती है.

चेतना की महत्त्वपूर्ण विकाश होती है, जब हम मित्रता पूर्ण विचारों को स्वीकार करते हैं और  अनावरत एसे काम काम को रूप देते हैं जो मानवता और हमारे लिये परम प्रेम पूर्ण विचार धारा को प्रतिबिम्बित करती है.

रजत बैगनी मैत्री समाज मैं दिक्षित स्वामी के लिये मानव जाती बंधुओं की सकारात्मक, सम्मानपूर्ण तथा मित्रवत सहायता ही मूल मंत्र है.रजत बैगनी मैत्री समाज मैं दिक्षित स्वामी अपनी आजीवन छात्र कि भूमिका को समझ ता है, वह निरन्तर एक अहिंसात्मक जीवन जापन प्रणलि को अभ्यास करते हुए अपनी मित्रों की पेमवत सहायता को स्वीकार करता है तथा अपनी अन्तर्ज्ञान मैं भरोसा करता है.सच्ची मित्रता के उच्चतर प्रेमपूर्ण अभ्यास को जीवन के हर स्थिति तथा हर स्तर मैं जीके उसीको प्रतिदरशित करने के द्वारा , वर्तमान से मित्रता स्थापन के लिये दीन प्रतीदीन नये अवसर प्राप्त होते हैं और इस पवित्र मित्रता को सभी जीवों के साथ बाँटने का मौका मिलता है.

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