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दीक्षा: परमपावन अर्थ...जीवन मैं लाना या लाया जाना, यह क्रिया अथवा प्रक्रिया दीक्षा है.

 

(द्रस्ट्व्य: मेरा अनुरोध है, सरल पठन हेतु, हम लोग ये याद रखें की हम, दोनो ही इश्वरिय नर तथा नारी हैं, और सारे सर्वनाम इसी इश्वरिय प्रकृति को दर्शाते हैं J)

 

सर्वोत्तम दिक्षा तभी होती है जब कोई अपनी समर्पित हृदय के सामर्थ्य पर अपने आपको 'एक' मैं पुनर्जन्म देता है; जब कोई सम्पूर्ण रूप से विश्वास करता है की उसका हृदय अभी परमात्मा के हातों मैं है.

जब ये होता है, आखों से पर्दे उठ जाते हैं, और वास्तविकता एक स्वच्छ तथा स्फुर्तियमान दीन के रूप मैं उदित होती है, ये हम सबको मैत्री के पवित्र बन्धन मैं बन्ध जाने के लिये आमंत्रित करता है, हर जीव तथा हर समय तथा अंतरिक्ष के हर रूप के संग...जहाँ हम अपने अंदर के ईश्वर से आमने सामने होते हैं और सारा जीवन के लिये सेवा, अनुकम्पा, निश्चितता और प्रेम का एक रोमन्चक यात्रा प्रारम्भ होती है.

~
स्वामी अमीनन्द

जो ‘रजत बैगनी मैत्री स्वामी समाज’ को आदेश करते हैं वह लोग पवित्र मैत्री के वास्तविकता मैं जागृत होते हैं, जो मैत्री से पूर्ण विचार, कार्य तथा भावनात्मक प्रकाशन के माध्यम से एक अहिंसात्मक दुनियाँ को जन्म देती है.

हमारी समाज मैत्री को सर्वोत्तम श्रेणी के धर्मो मैं स्थान देती है, जो सभी विश्व के सभी जीबों मैं सार, एक मात्र 'स्रष्टा चेतना शक्ति' के साथ एक स्नेह पूर्ण मित्रता के रूप मैं गूंजती है.

चेतना की महत्त्वपूर्ण विकाश होती है, जब हम मित्रता पूर्ण विचारों को स्वीकार करते हैं और 

अनावरत एसे काम को रूप देते हैं जो मानवता और हमारे लिये परम प्रेम पूर्ण विचार धारा को प्रतिबिम्बित करती है.

‘
रजत बैगनी मैत्री समाज’ मैं दिक्षित स्वामी के लिये मानव जाती बंधुओं की सकारात्मक, सम्मानपूर्ण तथा मित्रवत सहायता ही मूल मंत्र है.रजत बैगनी मैत्री समाज मैं दीक्षित स्वामी अपनी आजीवन छात्र कि भूमिका को समझ ता है, वह निरन्तर एक अहिंसात्मक जीवन जापन प्रणलि को अभ्यास करते हुए अपनी मित्रों की पेमवत सहायता को स्वीकार करता है तथा अपनी अन्तर्ज्ञान मैं भरोसा करता है.सच्ची मित्रता के उच्चतर प्रेमपूर्ण अभ्यास को जीवन के हर स्थिति तथा हर स्तर मैं जीके उसीको प्रतिदर्शित करने के द्वारा, वर्तमान से मित्रता स्थापन के लिये दीन प्रतीदीन नये अवसर प्राप्त होते हैं और इस पवित्र मित्रता को सभी जीवों के साथ बाँटने का मौका मिलता है.

 

मैत्री समाज दीक्षा के सोपान

 

·         इश्वरिय निमंत्रण की पहचान तथा मान्यता

·         जोगदान की इच्छा

·         मानवता के भिन्न भिन्न प्रवेश द्वार मैं से गुज़रना (कृपया इसके उपर ध्यान के दौरान विचार करें. आप अपनी अत्मबोध से आनंद ले सकेंगे !)

 

·         इस 'पवित्र मैत्री समाज सक्रियण संकेत' के उपर ध्यान तथा विचार,:   


  आध्यात्मिक उपवास (इसको करने का एक मार्ग है लगातार अपने विचारों से अभिज्ञ रहना और उपाय तथा संकल्प के साथ....उन सारे विचारों को दूर करना जो मानव जाती के श्रेष्ठ तथा सर्वोत्तम हित मैं नहीं है.अपने उपर उदारता दिखाएँ! छोटि अवधि से प्रारंभ करें... सम्भवतः एक घंटा. अपनी शक्तियों का विनियोग करें. हमेशा अपने उपर उदारता दिखाएँ.

 

·         मौन विश्राम

·         अंतर मैं छुपे हुए प्रभु को पुनर्जन्म करना (श्री माताजी की अनुरोध से, इसका मतलब है कम से कम एक ‘ट्रन्सेडेन्टल रिबर्थिन्ग(अन्तरज्ञान के माध्यम से पुनर्जन्म लेना)’ कार्यशाला का पूर्ण होना.)

·         सांकेतिक सिर मुंडन (कृपया...कोई आपसे सिर मुंडन करने के लिये नहीं कह रहा है ! :) ये आप अपनी कल्पना मैं करें!)

·         नामकरण समारोह (संस्थापको की और से)

·         हृदय शक्तिपथ (संस्थापको की और से)

·         व्यक्तिगत मन्त्र (संस्थापको की और से)

·         अंतरीय देवालय यात्रा (संस्थापको की और से)

·         दीक्षाग्रहण समारोह (संस्थापको की और से)

·         सेष (पट्टा) का सांकेतिक महत्त्व (संस्थापको की और से)

·         अपनी उच्चतर व्यक्तित्व से सम्मति

·         'रजत वैगनी मैत्री समाज' के स्वामी के रूप मैं जीना

·         दिल खोलके हसना तथा जीवन का आनंद लेना ! 

 

मैत्री समाज मैं दीक्षित होने का अर्थ है, अंतरस्थ इश्वरिय सत्ता को अभिस्वीकृति प्रदान करना तथा सभी जीवों से मित्रता की ज़िम्मेदारी को पहचानना.

 

मैत्री समाज मैं दीक्षा सबके लिये है, जहाँ सभी जीव जिन्होने दीक्षा ग्रहण के लिये अपने अंतरस्थ ईश्वर के आमंत्रण को सुना है तथा समूह जीवों से मित्रता के लिये समर्पित हैं, उन सभिका स्वागत है.

 

दीक्षा से पूर्व अपने अंतरस्थ ईश्वर के आह्वान को महसूस करना ज़रूरी है.केवल आपको पता है की कब आप तैयार हैं. आप स्वाभाविक रूप से एक स्व-निरीक्षण  प्रक्रिया से होके गुजरेंगे, जो आपको अपने अंतरस्थ गुरु से पहचान करवायेगा. यह पहचान दीक्षा का प्रतीक है, जो स्वतः प्रवर्तित अपनी वास्तविक प्रकृति प्रकाशन के लिए संकेत प्रदान करेगि.तब आप अपने आपको यह महसूस करने के लिये इजाज़त दे सकते हैं, की आप ज़िम्मेदारी के साथ जियेन्गे तथा विश्व के सभी नियमों से निरंतर अभिज्ञ रहेंगे, उनका सम्मान करेंगे तथा सभी जीवों के साथ मित्रता पूर्ण जीवन निर्वाह करेंगे.

 

दीक्षा समारोह (इसका वर्णन बाद मैं किया गया है) के इस अल्प समय के दौरान, एक उच्चतर सहमति होती है; एक व्यक्तिगत, पवित्र नाम दिया जाता है; उसके साथ एक मन्त्र भी दी जा सकती है. यह समारोह का संचालन संस्थापकों के विवेक के अनुरूप हो सकती है और उसका प्रबन्ध आमने सामने अथवा उर्जा स्रोत के माध्यम से (इसका अर्थ है, आप और संस्थापकों मैं शारीरिक दूरी हो सकती है) उसी प्रभाव के साथ संपूर्ण होती है.

 

हमारे सबके अंतर से 'एक' के रूप मैं जो मित्रता तथा प्रेम जाग्रत होती है उसीके ईश्वरीय चेतना मैं यह नूतन यात्रा प्रारंभ हो चुकी है!...यह मित्रता पूर्ण है जो विश्व स्तरीय बुद्धि तथा समूह चेतना को तत्काल प्रभबित करती है. इसके द्वारा हमारे बच्चो के लिये, हमारे तथा सभी जीवों के लिये एक बेहतर संतुलित जगत हेतु नये अवसरों के उत्पत्ति होते हैं, जहाँ हम सृष्टि, जीवन तथा हमारे अपने तरफ ज़िम्मेदारी से, पूरी तरह अभिज्ञ होते हैं.

 

दीक्षित स्वामी जाग्रत होके 'समाज' तथा ‘हायर स्कूल फर कनस्यस इभल्युसन(चेतना शक्ति की विकाश के लिये उच्च विद्यालय)’ मैं जो उच्चतर सिद्धान्तों का अध्ययन तथा सिखाया जाता है उनका अभ्यास और अभिब्यक्ति का परिणाम को मुख्यतः अपने आपको प्रदार्शित करता है. स्वामी, विविधता मैं एकता तथा उस शक्ति रूपी खजाना, जो व्यक्ति विशेष को ईश्वरीय चेतना मैं ढलने से मिलती है, जहां पे परमात्मा का वास्तविक शक्ति का वास है वह देख सकता है.

 

'मैत्री समाज' का स्वामी 'समाज' के लिये कोई भी व्यक्तिगत लक्ष्य का वलिदान नहीं देता; और असल मैं, प्रत्येक वह व्यक्ति जो स्वामी के रूप मैं दीक्षित हुआ है, उसको आदान-प्रदान करने के लीये स्वागत किया जाता है तथा वास्तव मैं वह गुण तथा शक्तियां जो उसको अनूठा बनाते हैं उनका आदान-प्रदान करने के लिये निमन्त्रण किया जाता है.

 

‘मैत्री समाज’ मैं दीक्षित स्वामी वर्तमान से पवित्र मित्रता स्तपान हेतु दैनिक मानसिक-आध्यात्मिक आहार के रूप मैं अगले नियमों का पालन करता है :

 

·         हलकापन (आत्मा का, मन का, हृदय का)

·         फुर्तिलापन (समय के साथ चलना)

·         संतुलन (ईश्वर के साथ योग से अंतर्निहित शक्ति)

·         स्थिरता

·         दृढता

·         शून्यता (वर्तमान मैं जो कुछ भी है...उसके प्रति खुला रहना)

·         कर्त्तब्य-निष्ठा (वचन मैं तथा कर्म मैं)

·         जीवन का कृतज्ञ रहना तथा उसका आनंद लेना

 

सारे उत्तर अंतर मैं ही हैं ! योग करे, ध्यान करें और इस तरह से ज्ञान को अपने चेतन मैं आने दें.

 

‘रजत वैगनी मैत्री समाज’ का स्वामी विश्व के नियमों का सम्मान तथा पठन करता है, जिसमे 'क्वान्टम फिज़िक्स' भी समिल है, कौन से विचार 'सही या ग़लत' हैं इस तरह के मिथ्या धारणाओं से अपने आपको अंतर द्वन्द मैं ना डालते हुए अपने दिमाग़ को सभी सांभाबनाओं के लिये खुला रखता है.स्वामी निरंतर सबके लिये शांति, मैत्री, आनंद तथा प्रेम का चयन कर सकता है.  

 

वह विज्ञान और आध्यात्म के बीच मैं अंतर नहीं करता तथा सभी संभाबनाओं के लिये खुला रहता है;वह हमेसा सजग रहता है, इस लिये की उसकी सोच उसे वास्तविकता से माया की और लेके जा सकती है.उस दसा मैं जब उसको बाहरी दुनिया धुंधला लगने लगे तब अपने आपको केंद्रित करने के लिये तथा पुनः सत्यता को अपनी उच्चतर द्रुस्टि से समझ ने के लिये मौन रहने की सलाह दी जाती है.

 

दीक्षित स्वामी का 'समाज' के संस्थापको के साथ सनातन संबंध रहेगा तथा उसको अपनी दक्ष्यता-देय  ‘हायर स्कूल फर कनस्यस इभल्युसन(चेतना शक्ति की विकाश के लिये उच्च विद्यालय)’ मैं सिखाने के लिये समर्थन प्राप्त होगी.

 

हम खाने के मामले मैं कोई नियम का पालन नहीं करते...इसको छोड्के की दीक्षित स्वामी अपने प्रति और सभी जीवों के प्रति अहिंसक होने के लिये निश्चित करता है तथा समर्पित होता है.‘रजत बैगनी मैत्री समाज’ के स्वामी स्व-विनाशकारी आदतों से दूर रहता है तथा ईश्वर अंतर मैं है इस पवित्र स्वीकृति के साथ शरीर को देवालय की मर्यादा देता है.

 

स्वामी को एक रजत बैंगनी सेष(पट्टा) मध्य उपलब्ध की जा सकती है.सेष(पट्टा) मैं रजत रंग, वह सारे सिद्धान्त तथा नियम जो दैनिक अभ्यास के लिये सूचित हैं उनका अभिव्यक्ति प्रदर्शन करता है. बैंगनी रंग अपनी चयन शक्ति के प्रति ज़िम्मेदारी तथा सजगता को प्रदर्शन करती है, यह अपने आपको सभी आयामों मैं विस्तृत तथा आध्यात्म के पथ मैं अग्रसर करती है. बैंगनी रंग 'बैंगनी शिखा' की  उर्जा तथा जीवों के सर्वोच्चता और श्रेष्ठता के लिये 'रूपांतरण शक्ति' का भी याद दिलाता है.

 

दीक्षा एक व्यक्तिगत  समारोह मैं होती है.कोइ भी संस्थापक (स्वामी अमरानन्द, स्वामी नाडिआनन्द) समारोह का एकाधिक अंश संपूर्ण कर सकते हैं, यह दीक्षुक के आमने सामने हो सकती है, या फिर उर्जा स्रोत के माध्यम से, जहां पे शारीरिक उपस्थिति आवश्यक नहीं है. परिवर्तन हमेसा आंतरिक होती है तथा अनेक आयामों मैं एक साथ होती है.यह समारोह स्वामी अमिनन्द अथवा स्वामी शिवानन्द के द्वारा भी आयोजित हो सकती है. अनेक क्षेत्र मैं श्री बाबाजी नागराज अथवा अन्य कोई ईश्वर समान गुरु उनकी उपस्थिति का प्रकाश कर सकते हैं. कोई भी क्षेत्र मैं, समारोह का परिचालन सीधे श्री बाबाजी की मार्ग दर्शन मैं होती है, वह पवित्र नाम का चयन करते हैं या फिर चयन करने मैं मार्ग दर्शन करते हैं.

 

समारोह के दौरान, पवित्र अभिप्राय का बयान होता है. तब दीक्षुक अपनी ईच्छा से अपने अभिप्राय का बयान कर सकता है. स्वामी अपना पवित्र नाम तथा ‘रजत बैगनी मैत्री समाज’ के स्वामी का पदवी प्राप्त करता है. कुछ क्षेत्र मैं, एक मन्त्र दी जाती है. हृदय शक्तिपथ से, यथेस्ट परिमण मैं उर्जा संचरण होती है. दीक्षुक को यह निवेदन किया जाता है, उसके सोच से आध्यात्मिक लक्ष्य को पाने के लिये जो सबसे बड़ी बाधाएँ है उनको संस्थापकों को बताए. जब दीक्षुक अपनी बाधाओं को छोड़ने के लिये अपनी इच्छा प्रकाश करता है, संस्थापको मैं से कोई धर्मानुष्ठान करके उन बाधाओं का रूपांतरण करता है. यह नवीन स्वामी के लिये विस्मयपूर्ण शक्तिशाली उर्जा संचरण होती है.

 

और, सबके लिये 'अन्तिम' द्रष्टब्य है : मुझे लगता है मनोहर श्री युक्तेश्वर जी ने एक समय पे श्री योगानन्द जी को गंभीर पाके कुछ ऐसे ही कहाथा "ईश्वर के साथ रहने के लिये रूखा स्वभाव आवश्यक नहीं है" और..."ताकि हम अपने आपको बहत गंभीरता से ना लें..." चलो हम लोग सभी हसना याद रखें और जीवन के इस यात्रा से वास्तव मैं आनन्द लें! हां, हम लोग केन्द्रित हैं. हां हम लोग इस सार्वजनिक महान कर्म मैं वहत गहराई से जडित हैं. और, हां हम लोग समय समय पर निश्चित रूप से बहत मेहनत करते हैं (बहत आनन्दपुर्ण ढंग से). इसी लिये चलो हम सब मिलके सर्वोच्च और श्रेश्ठ तथा आमोदपूर्ण जीवन का निर्माण तथा उसका प्रकट करें... वह जीवन जो हम प्रेम मैं जीने के लिये यहां आये है.

 

आप सबको सर्वोच्च आशीर्वाद

संस्थापक ब्रुन्द

 

 

 

यह प्रलेख को उचित समझ ने पे वदला जा सकता है.

 


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